हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 114
घ॒र्मा सम॑न्ता त्रि॒वृतं॒ व्या॑पतु॒स्तयो॒र्जुष्टिं॑ मात॒रिश्वा॑ जगाम । दि॒वस्पयो॒ दिधि॑षाणा अवेषन्वि॒दुर्दे॒वाः स॒हसा॑मानम॒र्कम् ॥ (१)
दिगंतों में व्याप्त एवं दीप्तिशाली सूर्य-चंद्र ने तीनों लोकों को व्याप्त किया है. वायु ने इन दोनों की प्रसन्नता प्राप्त की है. देवों ने जिस समय सामवेद के मंत्रों के साथ सूर्य को प्राप्त किया, उस समय तीनों की रक्षा के लिए दिव्य जल बनाया. (१)
The sun-moon, which pervades the aziguas and the bright moon, has permeated the three realms. The wind has enjoyed the happiness of both of them. The devas created divine water to protect the three at the time when they received the sun with the mantras of the Samaveda. (1)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 114
ति॒स्रो दे॒ष्ट्राय॒ निरृ॑ती॒रुपा॑सते दीर्घ॒श्रुतो॒ वि हि जा॒नन्ति॒ वह्न॑यः । तासां॒ नि चि॑क्युः क॒वयो॑ नि॒दानं॒ परे॑षु॒ या गुह्ये॑षु व्र॒तेषु॑ ॥ (२)
यजमान हव्य देने के लिए अग्नि, सूर्य और वायु की उपासना करते हैं. इसके बाद परम यशस्वी देव इन्हें जानते हैं. विद्वान्‌ लोग इनका आदि कारण जानते हैं एवं परम गोपनीय व्रतों में संलग्न रहते हैं. (२)
Hosts worship agni, sun and air to give a havya. After this, the most successful God knows them. The learned people know the original reason for these and engage in the most secret fasts. (2)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 114
चतु॑ष्कपर्दा युव॒तिः सु॒पेशा॑ घृ॒तप्र॑तीका व॒युना॑नि वस्ते । तस्यां॑ सुप॒र्णा वृष॑णा॒ नि षे॑दतु॒र्यत्र॑ दे॒वा द॑धि॒रे भा॑ग॒धेय॑म् ॥ (३)
चार कोनों वाली वेदीरूपी युवती शोभन अंलकारों वाली, घी से चिकनी एवं स्तोत्रों को धारण करने वाली है. उस पर हव्यदाता यजमान एवं पुरोहितरूपी दो पक्षी बैठते हैं एवं देवगण अपना भाग प्राप्त करते हैं. (३)
The four-cornered altar-like young woman is adorned with antlers, smooth with ghee and wearing hymns. On it sit two birds of the husband's host and priestly form and the devas receive their share. (3)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 114
एकः॑ सुप॒र्णः स स॑मु॒द्रमा वि॑वेश॒ स इ॒दं विश्वं॒ भुव॑नं॒ वि च॑ष्टे । तं पाके॑न॒ मन॑सापश्य॒मन्ति॑त॒स्तं मा॒ता रे॑ळ्हि॒ स उ॑ रेळ्हि मा॒तर॑म् ॥ (४)
प्राणवायुरूपी पक्षी ब्रह्मांडरूपी सागर में घुसा. वह सारे संसार को देखता है. मैंने परिपक्व मन से उसे देखा है. उसे माता चाटती है और वह माता को चाटता है. (४)
The zoonoyrupi bird entered the cosmological sea. He sees the whole world. I have looked at him with a mature mind. His mother licks him and he licks the mother. (4)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 114
सु॒प॒र्णं विप्राः॑ क॒वयो॒ वचो॑भि॒रेकं॒ सन्तं॑ बहु॒धा क॑ल्पयन्ति । छन्दां॑सि च॒ दध॑तो अध्व॒रेषु॒ ग्रहा॒न्सोम॑स्य मिमते॒ द्वाद॑श ॥ (५)
क्रांतदर्शी विद्वान्‌ परमात्मारूपी एक ही पक्षी को अनेक प्रकार के वचनों से वर्णित करते हैं. वे यज्ञों में भांति-भांति के छंदों की रचना करते हैं तथा सोमरस के बारह पात्रों को स्थापित करते हैं. (५)
The kratandarsophys describe the same bird as divine with a variety of words. They compose a variety of verses in the yagnas and establish the twelve characters of the Somras. (5)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 114
ष॒ट्त्रिं॒शाँश्च॑ च॒तुरः॑ क॒ल्पय॑न्त॒श्छन्दां॑सि च॒ दध॑त आद्वाद॒शम् । य॒ज्ञं वि॒माय॑ क॒वयो॑ मनी॒ष ऋ॑क्सा॒माभ्यां॒ प्र रथं॑ वर्तयन्ति ॥ (६)
विद्वान्‌ ब्राह्मण चालीस छंदों की कल्पना करते हुए बारह सोमपात्रों की स्थापना करते हैं. वे विद्वान्‌ अपनी बुद्धि से यज्ञ को पूरा करके ऋकू एवं सोम मंत्रों की सहायता से अपना यज्ञरूपी रथ चलाते हैं. (६)
The learned Brahmins establish twelve somapatras, imagining forty verses. Those scholars complete the yajna with their wisdom and run their yajnarupi rath with the help of Riku and Som mantras. (6)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 114
चतु॑र्दशा॒न्ये म॑हि॒मानो॑ अस्य॒ तं धीरा॑ वा॒चा प्र ण॑यन्ति स॒प्त । आप्ना॑नं ती॒र्थं क इ॒ह प्र वो॑च॒द्येन॑ प॒था प्र॒पिब॑न्ते सु॒तस्य॑ ॥ (७)
इस यज्ञरूपी परमात्मा की चौदह विभूतियां हैं. सात होता आदि धीर पुरुष मंत्रों द्वारा उसे पूरा करते हैं. जिस यज्ञमार्ग से चलकर देवगण सोमरस पीते हैं, उस विश्वव्याप्त ईश्वररूपी यज्ञ का वर्णन कौन कर सकता है? (७)
There are fourteen vibhutis of this sacrificial God. The seven would-be adi dheer men complete it by mantras. Who can describe the worldwide Godly yajna through which the gods drink somras? (7)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 114
स॒ह॒स्र॒धा प॑ञ्चद॒शान्यु॒क्था याव॒द्द्यावा॑पृथि॒वी ताव॒दित्तत् । स॒ह॒स्र॒धा म॑हि॒मानः॑ स॒हस्रं॒ याव॒द्ब्रह्म॒ विष्ठि॑तं॒ ताव॑ती॒ वाक् ॥ (८)
पंद्रह हजार उक्थमंत्र द्यावा-पृथिवी के समान ही विस्तृत हैं. हमारे स्तोत्रों की महिमा हजारों प्रकार की है. स्तोत्रों के समान वाणी भी असीम है. (८)
Fifteen thousand ukthamtras are as wide as Dyava-Prithvivi. The glory of our hymns is of thousands of types. Like hymns, the voice is also limitless. (8)
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