ऋग्वेद (मंडल 10)
इ॒मं नो॑ अग्न॒ उप॑ य॒ज्ञमेहि॒ पञ्च॑यामं त्रि॒वृतं॑ स॒प्तत॑न्तुम् । असो॑ हव्य॒वाळु॒त नः॑ पुरो॒गा ज्योगे॒व दी॒र्घं तम॒ आश॑यिष्ठाः ॥ (१)
हे अग्नि! तुम हमारे पांच नियामकों वाले, तीन प्रकार से अनुष्ठित एवं तीन होताओं वाले यज्ञ में आओ. तुम हमारे हव्यवाहक बनो, हमारे पुरोगामी बनो एवं हमें छोड़कर अधिक समय तक गुफा के अंधेरे में सोओ. (१)
O agni! You come to our five regulators, three ways, and three-sided yajnas. Be our bearers, be our forerunners, and leave us and sleep in the darkness of the cave for a long time. (1)
ऋग्वेद (मंडल 10)
अदे॑वाद्दे॒वः प्र॒चता॒ गुहा॒ यन्प्र॒पश्य॑मानो अमृत॒त्वमे॑मि । शि॒वं यत्सन्त॒मशि॑वो॒ जहा॑मि॒ स्वात्स॒ख्यादर॑णीं॒ नाभि॑मेमि ॥ (२)
अग्नि ने कहा— मैं देवों की प्रार्थना से गुहा में वर्तमान दीप्तिहीन दशा से दीप्ति को प्राप्त करके सबको देखता हुआ अमरता प्राप्त करता हूं. भली प्रकार पूर्ण हुए यज्ञ को मैं प्रकाशित होकर छोड़ता हूं एवं अपने चिरसखा व उत्पत्तिस्थान अरणि में चला जाता हूं. (२)
Agni said, "I attain immortality by looking at everyone by attaining the glow from the present glistening state in guha by the prayer of the gods. I leave the well-completed yajna illuminated and go to my eternal and genesis place, Arani. (2)
ऋग्वेद (मंडल 10)
पश्य॑न्न॒न्यस्या॒ अति॑थिं व॒याया॑ ऋ॒तस्य॒ धाम॒ वि मि॑मे पु॒रूणि॑ । शंसा॑मि पि॒त्रे असु॑राय॒ शेव॑मयज्ञि॒याद्य॒ज्ञियं॑ भा॒गमे॑मि ॥ (३)
मैं आकाश में गमन वाले सूर्य को देखता हुआ ऋतुओं के अनुरूप अनेक प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान करता हूं. मैं शक्तिशाली पितरों के सुख के लिए होता बनकर मंत्र बोलता हूं तथा यज्ञ के अनुपयुक्त स्थान से उपयुक्त स्थान में जाता हूं. (३)
I observe the sun moving in the sky and perform a variety of yagnas to suit the seasons. I speak mantras as i happen for the happiness of the mighty fathers and go from the inappropriate place of the yagna to the appropriate place. (3)
ऋग्वेद (मंडल 10)
ब॒ह्वीः समा॑ अकरम॒न्तर॑स्मि॒न्निन्द्रं॑ वृणा॒नः पि॒तरं॑ जहामि । अ॒ग्निः सोमो॒ वरु॑ण॒स्ते च्य॑वन्ते प॒र्याव॑र्द्रा॒ष्ट्रं तद॑वाम्या॒यन् ॥ (४)
मैंने इस यज्ञस्थान में अनेक वर्ष बिताए हैं. मैं यहां इंद्र का वरण करता हुआ अपने पिता अरणि को छोड़ता हूं. मेरे छिप जाने पर अग्नि, सोम एवं वरुण का पतन होता है तथा राष्ट्र में अव्यवस्था फैल जाती है. तब मैं आकर असुरों से रक्षा करता हूं. (४)
I have spent many years in this yagnasthan. I leave my father Arani here, selecting Indra. When I go into hiding, Agni, Som and Varuna fall and chaos spreads in the nation. Then I come and protect from the asuras. (4)
ऋग्वेद (मंडल 10)
निर्मा॑या उ॒ त्ये असु॑रा अभूव॒न्त्वं च॑ मा वरुण का॒मया॑से । ऋ॒तेन॑ राज॒न्ननृ॑तं विवि॒ञ्चन्मम॑ रा॒ष्ट्रस्याधि॑पत्य॒मेहि॑ ॥ (५)
मेरे आते ही राक्षस शक्तिहीन हो गए. हे वरुण! तुम भी मेरी अभिलाषा करते हो. हे राजन्! तुम सत्य से मिथ्या को अलग करते हुए मेरे राष्ट्र के अधिपति बनो. (५)
The demons became powerless as soon as I arrived. Hey Varun! You also wish me. Oh, King! You separate the falsehood from the truth, and be the lords of my nation. (5)
ऋग्वेद (मंडल 10)
इ॒दं स्व॑रि॒दमिदा॑स वा॒मम॒यं प्र॑का॒श उ॒र्व१॒॑न्तरि॑क्षम् । हना॑व वृ॒त्रं नि॒रेहि॑ सोम ह॒विष्ट्वा॒ सन्तं॑ ह॒विषा॑ यजाम ॥ (६)
हे सोम! देखो, यह स्वर्ग है. यह अत्यंत सुंदर था. यह प्रकाश एवं विस्तृत आकाश है. हे सोम! तुम आओ, जिससे हम वृत्र का वध कर सकें. तुम हवन के योग्य द्रव्य हो. हम अन्य होमसंबंधी द्रव्यों के साथ तुम्हारा यज्ञ करें. (६)
Hey Mon! Look, it's heaven. It was extremely beautiful. It is light and wide sky. Hey Mon! You come, so that we may slay the vritra. You are a dish worthy of havan. Let us sacrifice you with other home-related substances. (6)
ऋग्वेद (मंडल 10)
क॒विः क॑वि॒त्वा दि॒वि रू॒पमास॑ज॒दप्र॑भूती॒ वरु॑णो॒ निर॒पः सृ॑जत् । क्षेमं॑ कृण्वा॒ना जन॑यो॒ न सिन्ध॑व॒स्ता अ॑स्य॒ वर्णं॒ शुच॑यो भरिभ्रति ॥ (७)
क्रांतदर्शी मित्र ने अपने कवित्व से स्वर्ग में अपना तेज स्थिर किया है. वरुण ने बिना प्रयास के ही जल को बादलों से निकाला. जगत् का कल्याण करने वाली नदियां वरुण की पत्नी के समान दीप्तिशालिनी बनकर वरुण के उज्ज्वल रूप को धारण करती हैं. (७)
The revolutionary friend has stabilized his speed in heaven with his poetry. Varun pulled the water out of the clouds without any effort. The rivers that do the good of the world, like Varun's wife, become a brighter form of Varuna by becoming a radiant shalini. (7)
ऋग्वेद (मंडल 10)
ता अ॑स्य॒ ज्येष्ठ॑मिन्द्रि॒यं स॑चन्ते॒ ता ई॒मा क्षे॑ति स्व॒धया॒ मद॑न्तीः । ता ईं॒ विशो॒ न राजा॑नं वृणा॒ना बी॑भ॒त्सुवो॒ अप॑ वृ॒त्राद॑तिष्ठन् ॥ (८)
जल वरुण के अत्यंत विशाल तेज को धारण करते हैं एवं अन्न पाकर प्रसन्न होते हैं. वरुण पत्नी के समान उन जलों के पास आते हैं. जिस प्रकार प्रजा राजा र पास जाती है, उसी प्रकार जल भयभीत होकर वृत्र के पास से वरुण के पास जाकर ठहरते हैं. (८)
The water holds the very huge brightness of Varuna and is happy to get food. Varun comes to those waters like his wife. Just as the people go to the king, so the water is frightened and stay with Varuna from the vritra. (8)