ऋग्वेद (मंडल 10)
न तमंहो॒ न दु॑रि॒तं देवा॑सो अष्ट॒ मर्त्य॑म् । स॒जोष॑सो॒ यम॑र्य॒मा मि॒त्रो नय॑न्ति॒ वरु॑णो॒ अति॒ द्विषः॑ ॥ (१)
हे देवो! उस पुरुष को कोई भी अमंगल एवं पाप प्राप्त नहीं करता, जिसे अर्यमा, मित्र एवं वरुण मिलकर श्रु के हाथ से बचाते हैं. (१)
O God! No one receives the evil and sin of that man, whom Aryama, friends and Varuna together save from Shru's hand. (1)