ऋग्वेद (मंडल 10)
यो य॒ज्ञो वि॒श्वत॒स्तन्तु॑भिस्त॒त एक॑शतं देवक॒र्मेभि॒राय॑तः । इ॒मे व॑यन्ति पि॒तरो॒ य आ॑य॒युः प्र व॒याप॑ व॒येत्या॑सते त॒ते ॥ (१)
आकाश आदि तंतुओं द्वारा जो सर्गरूप यज्ञ सब ओर विस्तृत है, वह सौ देव संबंधी कर्मो से व्याप्त है. प्रजापति के पालक देव जो सारी सूष्टि में व्याप्त हैं, वे इस प्रपंच का निर्माण करते हैं. वे ही इस विस्तृत विश्व के प्राण हैं. (१)
The sargarupa yajna which is spread all over the sky, etc., is pervaded by the deeds of a hundred gods. Prajapati's foster god, who pervades all the susti, creates this prapancha. They are the souls of this vast world. (1)