हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.130.5

मंडल 10 → सूक्त 130 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 130
वि॒राण्मि॒त्रावरु॑णयोरभि॒श्रीरिन्द्र॑स्य त्रि॒ष्टुबि॒ह भा॒गो अह्नः॑ । विश्वा॑न्दे॒वाञ्जग॒त्या वि॑वेश॒ तेन॑ चाकॢप्र॒ ऋष॑यो मनु॒ष्याः॑ ॥ (५)
विराट्‌ छंद मित्र और वरुण का आश्रित हुआ.. त्रिष्टुप्‌ छंद एवं माध्यंदिन का सोमरस इंद्र के भाग में पड़ा. जगती छंद ने सभी देवों का आश्रय लिया. इन छंदों द्वारा ऋषियों और मनुष्यों ने यज्ञ की कल्पना की. (५)
Virata became a friend of verses and dependent of Varun.. The somras of trishtup verses and medians lay in the part of Indra. Jagati verses took shelter of all the gods. Through these verses sages and men conceived of the yajna. (5)