ऋग्वेद (मंडल 10)
त्वामु॑ जा॒तवे॑दसं वि॒श्ववा॑रं गृणे धि॒या । अग्ने॑ दे॒वाँ आ व॑ह नः प्रि॒यव्र॑तान्मृळी॒काय॑ प्रि॒यव्र॑तान् ॥ (३)
हे जातवेद एवं सबके द्वारा वरण करने योग्य अग्नि! मैं स्तुतियों द्वारा तुम्हारी प्रशंसा करता हूं. हे अग्नि! प्रियव्रत वाले अग्नि को हमारे सुख के लिए लेकर यहां आओ. (३)
O Jataveda and a agni that is chosen by all! I admire you with praises. O agni! Bring the agni of priyavrat here for our happiness. (3)