हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 150
समि॑द्धश्चि॒त्समि॑ध्यसे दे॒वेभ्यो॑ हव्यवाहन । आ॒दि॒त्यै रु॒द्रैर्वसु॑भिर्न॒ आ ग॑हि मृळी॒काय॑ न॒ आ ग॑हि ॥ (१)
हे देवों के लिए हव्य वहन करने वाले तथा प्रज्वलित अग्नि! तुम्हें दीप्त किया गया है. तुम आदित्यों, वसु.ओं और रुद्रों के साथ सुख देने के लिए इस यज्ञ में पधारो. (१)
O agni that carries a curse to the gods and is ignited! You've been illuminated. You come to this yagna to give happiness with adityas, vasu.s and rudras. (1)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 150
इ॒मं य॒ज्ञमि॒दं वचो॑ जुजुषा॒ण उ॒पाग॑हि । मर्ता॑सस्त्वा समिधान हवामहे मृळी॒काय॑ हवामहे ॥ (२)
हे अग्नि! यह यज्ञ एवं ये स्तुतियां तुम्हारी हैं. तुम सेवित होते हुए पास आओ. हे अग्नि! हम मनुष्य तुम्हें सुख के लिए बुलाते हैं. (२)
O agni! This sacrifice and these praises are yours. Come near you serving. O agni! We humans call you for happiness. (2)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 150
त्वामु॑ जा॒तवे॑दसं वि॒श्ववा॑रं गृणे धि॒या । अग्ने॑ दे॒वाँ आ व॑ह नः प्रि॒यव्र॑तान्मृळी॒काय॑ प्रि॒यव्र॑तान् ॥ (३)
हे जातवेद एवं सबके द्वारा वरण करने योग्य अग्नि! मैं स्तुतियों द्वारा तुम्हारी प्रशंसा करता हूं. हे अग्नि! प्रियव्रत वाले अग्नि को हमारे सुख के लिए लेकर यहां आओ. (३)
O Jataveda and a agni that is chosen by all! I admire you with praises. O agni! Bring the agni of priyavrat here for our happiness. (3)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 150
अ॒ग्निर्दे॒वो दे॒वाना॑मभवत्पु॒रोहि॑तो॒ऽग्निं म॑नु॒ष्या॒३॒॑ ऋष॑यः॒ समी॑धिरे । अ॒ग्निं म॒हो धन॑साताव॒हं हु॑वे मृळी॒कं धन॑सातये ॥ (४)
अग्नि देव देवों के पुरोहित बने. मनुष्यों और ऋषियों ने अग्नि को प्रज्वलित किया था. मैं धन पाने के लिए महान्‌ अग्नि को बुलाता हूं. वे मुझे सुखी करें. (४)
Agni dev became the priest of the gods. Humans and sages ignited the agni. I call the great agni to get the money. They make me happy. (4)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 150
अ॒ग्निरत्रिं॑ भ॒रद्वा॑जं॒ गवि॑ष्ठिरं॒ प्राव॑न्नः॒ कण्वं॑ त्र॒सद॑स्युमाह॒वे । अ॒ग्निं वसि॑ष्ठो हवते पु॒रोहि॑तो मृळी॒काय॑ पु॒रोहि॑तः ॥ (५)
अन्ने ने युद्ध में अत्रि, भरद्वाज, गविष्ठिर, कण्व और त्रसदस्यु की रक्षा की है. पुरोहित वसिष्ठ अग्नि को सुख के लिए बुलाते हैं. (५)
Anna has protected Atri, Bharadwaj, Gavisthira, Kanva and Tarshadsu in the war. Priest Vasishtha calls agni for happiness. (5)