हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.159.2

मंडल 10 → सूक्त 159 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 159
अ॒हं के॒तुर॒हं मू॒र्धाहमु॒ग्रा वि॒वाच॑नी । ममेदनु॒ क्रतुं॒ पतिः॑ सेहा॒नाया॑ उ॒पाच॑रेत् ॥ (२)
मैं ही केतु हूं, मैं ही मस्तक हूं, मैं ही प्रबल होकर स्वामी के मुख से मीठा वचन बुलवाती हूं. मेरे पति मेरे कार्यो की प्रशंसा करते हैं, मेरी सौतों के कार्यों की नहीं. मैंने सब सीतों को हरा दिया है. (२)
I am Ketu, I am the head, I am the one who prevails and invoke sweet words from the mouth of the Master. My husband admires my deeds, not the works of my sons. I've defeated all the stairs. (2)