हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.159.5

मंडल 10 → सूक्त 159 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 159
अ॒स॒प॒त्ना स॑पत्न॒घ्नी जय॑न्त्यभि॒भूव॑री । आवृ॑क्षम॒न्यासां॒ वर्चो॒ राधो॒ अस्थे॑यसामिव ॥ (५)
मैं शन्रुरहित एवं शत्रुओं का हनन करने वाली हूं. मैं शत्रुओं पर विजय पाती एवं उन्हें पराजित करती हूं. जिस प्रकार अस्थिर चित्त वालों का धन दूसरे ले जाते हैं, उसी प्रकार मैं दूसरी नारियों का तेज समाप्त कर देती हूं. (५)
I am a disloyal and an enemy abuser. I conquer and defeat my enemies. Just as the wealth of the unstable minded takes away by others, so I put an end to the speed of other women. (5)