हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 172
आ या॑हि॒ वन॑सा स॒ह गावः॑ सचन्त वर्त॒निं यदूध॑भिः ॥ (१)
हे उषा! तुम शोभन तेज के साथ आओ. भरे हुए थनों वाली गाएं मार्ग पर चल रही हैं. (१)
Oh, Usha! You come up with Shobhan Tej. The cows with full trunks are running on the route. (1)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 172
आ या॑हि॒ वस्व्या॑ धि॒या मंहि॑ष्ठो जार॒यन्म॑खः सु॒दानु॑भिः ॥ (२)
हे उषा! तुम प्रशंसनीय स्तुतियां लेकर आओ. यह काल शोभन दान वाले पुरुषों द्वारा दानयुक्त एवं यज्ञसमाप्ति का होता है. (२)
Oh, Usha! You bring praiseworthy praises. This period is of the charity and yajna samapti by men with shobhan daan. (2)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 172
पि॒तु॒भृतो॒ न तन्तु॒मित्सु॒दान॑वः॒ प्रति॑ दध्मो॒ यजा॑मसि ॥ (३)
अन्न के स्वामियों के समान शोभन दान वाले हम धागों के समान इस यज्ञ का विस्तार करते हैं एवं उस यज्ञ से उषा की पूजा करते हैं. (३)
We extend this yajna like threads and worship Usha with that yajna. (3)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 172
उ॒षा अप॒ स्वसु॒स्तमः॒ सं व॑र्तयति वर्त॒निं सु॑जा॒तता॑ ॥ (४)
उषा अपनी बहिन रात का अंधकार मिटाती है एवं अपना रथ भली प्रकार चलाती है. (४)
Usha removes the darkness of the night and drives her chariot well. (4)