ऋग्वेद (मंडल 10)
अ॒स॒प॒त्नः स॑पत्न॒हाभिरा॑ष्ट्रो विषास॒हिः । यथा॒हमे॑षां भू॒तानां॑ वि॒राजा॑नि॒ जन॑स्य च ॥ (५)
शत्रुरहित, शत्रुनाशक एवं शन्रुपराभवकारी मैं इन प्रजाओं एवं मंत्री आदि सेवकों का स्वामी बना हूं. (५)
I have become the master of these people and ministers, etc., who are hostile, hostile and resolute. (5)