ऋग्वेद (मंडल 10)
प॒तं॒गो वाचं॒ मन॑सा बिभर्ति॒ तां ग॑न्ध॒र्वो॑ऽवद॒द्गर्भे॑ अ॒न्तः । तां द्योत॑मानां स्व॒र्यं॑ मनी॒षामृ॒तस्य॑ प॒दे क॒वयो॒ नि पा॑न्ति ॥ (२)
वह आत्मारूपी पक्षी मन ही मन वचन को धारण करता है. गंधर्व ने यह बात उसे गर्भ में ही बताई है. विद्वान् लोग सत्य के मार्ग में उस दीप्तिशालिनी, स्वर्ग देने वाली एवं वृद्धि की स्वामिनी वाणी की रक्षा करते हैं. (२)
That soulful bird holds the word in the mind itself. Gandharva told this to her in the womb. Scholars protect that glistening, heaven-giving and the lordly voice of growth in the path of truth. (2)