हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.27.14

मंडल 10 → सूक्त 27 → श्लोक 14 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 27
बृ॒हन्न॑च्छा॒यो अ॑पला॒शो अर्वा॑ त॒स्थौ मा॒ता विषि॑तो अत्ति॒ गर्भः॑ । अ॒न्यस्या॑ व॒त्सं रि॑ह॒ती मि॑माय॒ कया॑ भु॒वा नि द॑धे धे॒नुरूधः॑ ॥ (१४)
नित्य गतिशील व महान्‌ आदित्य बिना पत्तों के पेड़ के समान छायारहित हैं. वर्षा द्वारा लोक निर्माण करने वाले, आलंबनरहित एवं तीनों लोकों के गर्भ के समान आदित्य हव्य भक्षण करते हैं. झुलोक रूपधारी गाय अदिति के पुत्र को प्रेम के साथ चाटती हुई पोषित करती है. द्यौरूपिणी गाय आदित्य को अपने थनों के समान धारण करती है. (१४)
The constant dynamic and great Aditya is as shadeless as a tree without leaves. Those who make people by rain, unfazed and like the womb of the three lokas, aditya eats havya. The jhuloka-shaped cow nourishes Aditi's son by licking him with love. The dyourupini cow holds Aditya like its trunks. (14)