ऋग्वेद (मंडल 10)
प्रति॒ यदापो॒ अदृ॑श्रमाय॒तीर्घृ॒तं पयां॑सि॒ बिभ्र॑ती॒र्मधू॑नि । अ॒ध्व॒र्युभि॒र्मन॑सा संविदा॒ना इन्द्रा॑य॒ सोमं॒ सुषु॑तं॒ भर॑न्तीः ॥ (१३)
हे जल! मैं देखता हूं कि तुम मेरे यज्ञ की ओर आते हुए घृत, दूध एवं शहद लाते हो. अध्वर्यु हमारे साथ सच्चे मन से बात करते हैं तथा तुम भली प्रकार निचोड़ा हुआ सोम इंद्र के लिए धारण करते हो. (१३)
O water! I see you coming to my yajna and bringing ghee, milk and honey. Adhwaryu speaks to us with a true heart and you hold for the well-squeezed Mon Indra. (13)