ऋग्वेद (मंडल 10)
प्र दे॑व॒त्रा ब्रह्म॑णे गा॒तुरे॑त्व॒पो अच्छा॒ मन॑सो॒ न प्रयु॑क्ति । म॒हीं मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य धा॒सिं पृ॑थु॒ज्रय॑से रीरधा सुवृ॒क्तिम् ॥ (१)
यज्ञ के समय सोमरस देवों के निमित्त उस प्रकार शीघ्र जल की ओर जावें, जिस प्रकार मन तेज चलता है. हे अध्वर्युजनो! मित्र एवं विस्तृत गति इंद्र के लिए महान् सोम को शुद्ध करो. (१)
At the time of yajna, the Somras should go to the water for the sake of the gods as soon as the mind moves fast. O adhwaryujano! Purify the great mon for friend and wide speed Indra. (1)
ऋग्वेद (मंडल 10)
अध्व॑र्यवो ह॒विष्म॑न्तो॒ हि भू॒ताच्छा॒प इ॑तोश॒तीरु॑शन्तः । अव॒ याश्चष्टे॑ अरु॒णः सु॑प॒र्णस्तमास्य॑ध्वमू॒र्मिम॒द्या सु॑हस्ताः ॥ (२)
हे हव्य धारण करने वाले अध्वर्युजनो! तुम सोम से युक्त हो जाओ. सोमरस निचोड़ने की अभिलाषा करने वाले तुम सोमरस की कामना करने वाले जलों की ओर जाओ. हे सुंदर हाथों वाले अध्वर्युजनो! यह सोम लाल रंग के पक्षी की तरह नीचे गिरता है, उसे तरंग के रूप में दशापवित्र पर डालो. (२)
Those who hold this havya, the adhwaryujano! You get consisted of mon. Those who wish to squeeze the somras go to the waters that wish for somras. O you have beautiful hands! It falls down like a bird of mon red, pour it on the dashapavittra as the waveform. (2)
ऋग्वेद (मंडल 10)
अध्व॑र्यवो॒ऽप इ॑ता समु॒द्रम॒पां नपा॑तं ह॒विषा॑ यजध्वम् । स वो॑ दददू॒र्मिम॒द्या सुपू॑तं॒ तस्मै॒ सोमं॒ मधु॑मन्तं सुनोत ॥ (३)
हे अध्वर्युजनो! यहां से जलपूर्ण सागर में जाओ तथा जलों के नाती अर्थात् अग्नि देव का होम करो. वे अग्नि आज तुम्हें अत्यंत शुद्ध जल की लहरें प्रदान करें तुम उनके लिए मधुर सोमरस निचोड़ो. (३)
O adhwaryujano! From here go to the water-filled ocean and do the home of the grandson of the waters, that is, the god of agni. They agni today to provide you waves of extremely pure water you squeeze the sweet somras for them. (3)
ऋग्वेद (मंडल 10)
यो अ॑नि॒ध्मो दीद॑यद॒प्स्व१॒॑न्तर्यं विप्रा॑स॒ ईळ॑ते अध्व॒रेषु॑ । अपां॑ नपा॒न्मधु॑मतीर॒पो दा॒ याभि॒रिन्द्रो॑ वावृ॒धे वी॒र्या॑य ॥ (४)
जो जल के नाती अग्नि देव जलों के भीतर काष्ठों के बिना भी जलते हैं एवं ब्राह्मण यज्ञों में जिनकी स्तुति करते हैं, वे हमें ऐसा मधुर जल दें, जिसे पीकर इंद्र वीरता के कर्म करने के लिए बढ़ें. (४)
Those who burn without wood inside the waters of the agni god water and whom the Brahmins praise in the yagnas, give us such sweet water, by drinking which Indra grows up to perform the deeds of bravery. (4)
ऋग्वेद (मंडल 10)
याभिः॒ सोमो॒ मोद॑ते॒ हर्ष॑ते च कल्या॒णीभि॑र्युव॒तिभि॒र्न मर्यः॑ । ता अ॑ध्वर्यो अ॒पो अच्छा॒ परे॑हि॒ यदा॑सि॒ञ्चा ओष॑धीभिः पुनीतात् ॥ (५)
हे अध्वर्युजनो! जिस प्रकार सुंदरी युवतियों से मिलकर पुरुष हर्षित और प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार जिन जलों से मिलकर सोम मुदित होते हैं, उन्हीं जलों को लाने के लिए जाओ. लाए हुए जलों से सोम को धोओ और सोम के साथ-साथ दशापवित्र को शुद्ध करो. (५)
O adhwaryujano! Just as men are joyful and happy to meet beautiful young women, so go to fetch the same waters with which the soma mudit comes from. Wash the som with the brought waters and purify the dashapavitra along with the mon. (5)
ऋग्वेद (मंडल 10)
ए॒वेद्यूने॑ युव॒तयो॑ नमन्त॒ यदी॑मु॒शन्नु॑श॒तीरेत्यच्छ॑ । सं जा॑नते॒ मन॑सा॒ सं चि॑कित्रेऽध्व॒र्यवो॑ धि॒षणाप॑श्च दे॒वीः ॥ (६)
जिस प्रकार अभिलाषापूर्ण युवक, पुरुष की कामना करने वाली युवती को पाकर नम्र हो जाता है, उसी प्रकार जल सोम की ओर अनुकूल बनकर बहते हैं. अध्वर्युजनों एवं उनकी स्तुतियों से जलदेव का विशेष परिचय है. दोनों एक-दूसरे के उपकार को देखते हैं. (६)
Just as the desireful young man becomes humble to find a young woman who wishes for a man, so the water flows towards The Mon. There is a special introduction to the adhwaryujans and their praises. The two see each other's favors. (6)
ऋग्वेद (मंडल 10)
यो वो॑ वृ॒ताभ्यो॒ अकृ॑णोदु लो॒कं यो वो॑ म॒ह्या अ॒भिश॑स्ते॒रमु॑ञ्चत् । तस्मा॒ इन्द्रा॑य॒ मधु॑मन्तमू॒र्मिं दे॑व॒माद॑नं॒ प्र हि॑णोतनापः ॥ (७)
हे जलो! जिस इंद्र ने तुम्हारे मेघ द्वारा घिरे होने पर निकलने के लिए मार्ग बनाया एवं जिसने तुम्हें मेघ की कठिन पकड़ से छुड़ाया, उसी इंद्र के लिए मधुरतापूर्ण तथा देवों को प्रमुदित करने वाली अपनी लहर भेजो. (७)
O burn! Send your wave of sweetness and pleasing to the gods to the same Indra who made the way out when you are surrounded by the cloud and who rescued you from the difficult grip of the cloud. (7)
ऋग्वेद (मंडल 10)
प्रास्मै॑ हिनोत॒ मधु॑मन्तमू॒र्मिं गर्भो॒ यो वः॑ सिन्धवो॒ मध्व॒ उत्सः॑ । घृ॒तपृ॑ष्ठ॒मीड्य॑मध्व॒रेष्वापो॑ रेवतीः शृणु॒ता हवं॑ मे ॥ (८)
हे बहने वाले जलो! तुम्हारे गर्भ के समान मधुर रस वाला जो झरना है, उसकी मधुर तरंग को इंद्र के लिए भेजो. हे धनयुक्त जलो! मेरी पुकार सुनो. तुम्हारी तरंग यजञों में घृतयुक्त एवं प्रशंसनीय है. (८)
O burn the flowing! Send the sweet wave of the waterfall, which is as sweet as your womb, to Indra. O burn rich! Listen to my call. Your wave is disgusting and admirable in the yajjanas. (8)