हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.30.3

मंडल 10 → सूक्त 30 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 30
अध्व॑र्यवो॒ऽप इ॑ता समु॒द्रम॒पां नपा॑तं ह॒विषा॑ यजध्वम् । स वो॑ दददू॒र्मिम॒द्या सुपू॑तं॒ तस्मै॒ सोमं॒ मधु॑मन्तं सुनोत ॥ (३)
हे अध्वर्युजनो! यहां से जलपूर्ण सागर में जाओ तथा जलों के नाती अर्थात्‌ अग्नि देव का होम करो. वे अग्नि आज तुम्हें अत्यंत शुद्ध जल की लहरें प्रदान करें तुम उनके लिए मधुर सोमरस निचोड़ो. (३)
O adhwaryujano! From here go to the water-filled ocean and do the home of the grandson of the waters, that is, the god of agni. They agni today to provide you waves of extremely pure water you squeeze the sweet somras for them. (3)