हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.32.3

मंडल 10 → सूक्त 32 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 32
तदिन्मे॑ छन्त्स॒द्वपु॑षो॒ वपु॑ष्टरं पु॒त्रो यज्जानं॑ पि॒त्रोर॒धीय॑ति । जा॒या पतिं॑ वहति व॒ग्नुना॑ सु॒मत्पुं॒स इद्भ॒द्रो व॑ह॒तुः परि॑ष्कृतः ॥ (३)
इंद्र मुझे वही चमत्कारपूर्ण एवं धन के समान जन्म देने की कृपा करें, जिसे पाकर पुत्र पिता का धन प्राप्त करता है. यजमान की पत्नी यजमान को भले शब्दों द्वारा अपने पास बुलाती है. सोमरस उस उत्तम पुरुष के पास भली प्रकार जावे. (३)
May Indra please give me the same miraculous and wealthy birth, which the Son receives the wealth of the Father. The host's wife calls the host to her by good words. Somras go well to that perfect man. (3)