हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.32.4

मंडल 10 → सूक्त 32 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 32
तदित्स॒धस्थ॑म॒भि चारु॑ दीधय॒ गावो॒ यच्छास॑न्वह॒तुं न धे॒नवः॑ । मा॒ता यन्मन्तु॑र्यू॒थस्य॑ पू॒र्व्याभि वा॒णस्य॑ स॒प्तधा॑तु॒रिज्जनः॑ ॥ (४)
हे इंद्र! उस स्थान को अपने तेज से प्रकाशित करो, जहां स्तुतिरूप धारिणी गाएं मिलती हैं. स्तुतियों की प्राचीन एवं पूजा योग्य माता गायत्री के सातों छंद उसी स्थान पर हैं. (४)
O Indra! Illuminate the place with your brightness, where the praise-dharini songs meet. The seven verses of the ancient and worshipable Mother Gayatri of the hymns are at the same place. (4)