ऋग्वेद (मंडल 10)
पिप॑र्तु मा॒ तदृ॒तस्य॑ प्र॒वाच॑नं दे॒वानां॒ यन्म॑नु॒ष्या॒३॒॑ अम॑न्महि । विश्वा॒ इदु॒स्राः स्पळुदे॑ति॒ सूर्यः॑ स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे ॥ (८)
यज्ञों का देवस्तुतिरूपी भाग हमारी रक्षा करे. हम उसे जानते हैं. सूर्य प्रत्येक प्रभात में सभी वस्तुओं को स्पष्ट करते हुए आते हैं. हम प्रज्वलित अग्नि से कल्याण की याचना करते हैं. (८)
May the devasutiform part of the yagnas protect us. We know him. The sun comes in each morning clarifying all the objects. We beg for welfare from the ignited agni. (8)