हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.36.2

मंडल 10 → सूक्त 36 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 36
द्यौश्च॑ नः पृथि॒वी च॒ प्रचे॑तस ऋ॒ताव॑री रक्षता॒मंह॑सो रि॒षः । मा दु॑र्वि॒दत्रा॒ निरृ॑तिर्न ईशत॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे ॥ (२)
शोभन बुद्धि वाली एवं यज्ञ के योग्य द्यावा-पृथिवी हमें हिंसकों एवं पाप से बचावें. बुरी बुद्धि वाली मृत्यु हम पर अधिकार न कर सके. हम आज देवों की उसी रक्षा की याचना करते हैं. (२)
May the brave-minded and worthy of yajna protect us from violent and sin. Death with evil intellects could not take over us. We ask for the same protection of gods today. (2)