ऋग्वेद (मंडल 10)
चो॒दय॑तं सू॒नृताः॒ पिन्व॑तं॒ धिय॒ उत्पुरं॑धीरीरयतं॒ तदु॑श्मसि । य॒शसं॑ भा॒गं कृ॑णुतं नो अश्विना॒ सोमं॒ न चारुं॑ म॒घव॑त्सु नस्कृतम् ॥ (२)
हे अश्चिनीकुमारो! हमें मधुर वचन बोलने को प्रेरित करो, हमारे यज्ञकर्मो को पूर्ण करो व हम में बहुत सी बुद्धियां उत्पन्न करो. हम इन तीनों की कामना करते हैं. हमें यशस्वी धन दो. हम सोमरस के समान यजमानों को प्रसन्न करने वाले बनें. (२)
O aschinikumaro! Encourage us to speak sweet words, fulfill our sacrificial deeds and instill in us many wisdoms. We wish these three. Give us successful money. Let us be the same as the Somras to please the hosts. (2)