हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.39.3

मंडल 10 → सूक्त 39 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 39
अ॒मा॒जुर॑श्चिद्भवथो यु॒वं भगो॑ऽना॒शोश्चि॑दवि॒तारा॑प॒मस्य॑ चित् । अ॒न्धस्य॑ चिन्नासत्या कृ॒शस्य॑ चिद्यु॒वामिदा॑हुर्भि॒षजा॑ रु॒तस्य॑ चित् ॥ (३)
हे अश्विनीकुमार! तुम पिता के घर में वृद्ध होती हुई भाग्यहीन घोषा के लिए वर खोजकर सौभाग्यशाली बने. तुम चलने में असमर्थ एवं अत्यंत निम्न जाति वालों के रक्षक बनते हो. लोग तुम्हें अंधे और दुर्बलों का ही नहीं, यज्ञ का वैद्य भी कहते हैं. (३)
O Ashwinikumar! You became lucky to find a groom for the aging fortuneless Ghosha in the father's house. You are unable to walk and become protectors of the very low jatis. People call you not only the blind and the weak, but also the vaidya of the yajna. (3)