हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.39.4

मंडल 10 → सूक्त 39 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 39
यु॒वं च्यवा॑नं स॒नयं॒ यथा॒ रथं॒ पुन॒र्युवा॑नं च॒रथा॑य तक्षथुः । निष्टौ॒ग्र्यमू॑हथुर॒द्भ्यस्परि॒ विश्वेत्ता वां॒ सव॑नेषु प्र॒वाच्या॑ ॥ (४)
हे अश्विनीकुमार! जिस प्रकार बढ़ई पुराने रथ को नया बनाकर चलने योग्य कर देता है, उसी प्रकार तुमने वृद्ध च्यवन ऋषि को जवान बनाकर चलने-फिरने लायक कर दिया था. तुमने तुग्र के पुत्र भुज्यु को जल के ऊपर तैराकर किनारे पर लगा दिया था. तुम्हारे वे कार्य यज्ञ के समय विशेषरूप से वर्णन करने योग्य हैं. (४)
O Ashwinikumar! Just as the carpenter makes the old chariot new and makes it walkable, so you made the old Chyawan sage young and able to walk. You put Bhujyu, son of Tugrah, on the edge of the swim on top of the water. Those works of yours are particularly worth describing at the time of yajna. (4)