ऋग्वेद (मंडल 10)
स॒मा॒नमु॒ त्यं पु॑रुहू॒तमु॒क्थ्यं१॒॑ रथं॑ त्रिच॒क्रं सव॑ना॒ गनि॑ग्मतम् । परि॑ज्मानं विद॒थ्यं॑ सुवृ॒क्तिभि॑र्व॒यं व्यु॑ष्टा उ॒षसो॑ हवामहे ॥ (१)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम्हारे पास एक ही प्रशंसित एवं बहुतों द्वारा आहूत रथ है. तीन पहियों वाला वह रथ यज्ञां में जाता है. हम उस चारों ओर घूमने वाले एवं यज्ञ के लिए हितकारी रथ को प्रतिदिन प्रातःकाल सुंदर स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं. (१)
O aschinikumaro! You have the same acclaimed and many-called chariot. The three-wheeled chariot goes to the yagna. We call the revolving chariot around it and the benefactory chariot for the yagna every morning with beautiful praises. (1)