हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.41.3

मंडल 10 → सूक्त 41 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
अ॒ध्व॒र्युं वा॒ मधु॑पाणिं सु॒हस्त्य॑म॒ग्निधं॑ वा धृ॒तद॑क्षं॒ दमू॑नसम् । विप्र॑स्य वा॒ यत्सव॑नानि॒ गच्छ॒थोऽत॒ आ या॑तं मधु॒पेय॑मश्विना ॥ (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम मुझ हाथ में सोम धारण करने वाले, शोभनहस्त, शक्तिशाली, दानेच्छुक एवं अग्नि का आधान करने वाले अध्वर्यु के पास आओ. यदि तुम किसी बुद्धिमान्‌ यजमान के यज्ञों में जा रहे हो, तब भी उन यज्ञों को छोड़ कर हमारा सोमरस पीने के लिए आओ. (३)
O Ashwinikumaro! Come to the one who holds the monam in my hand, the adorned, the mighty, the grainy and the one who is the one who is worshiping the agni. If you are going to the yagnas of a wise man, still leave those yajnas and come to drink our somras. (3)