हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.44.9

मंडल 10 → सूक्त 44 → श्लोक 9 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
इ॒मं बि॑भर्मि॒ सुकृ॑तं ते अङ्कु॒शं येना॑रु॒जासि॑ मघवञ्छफा॒रुजः॑ । अ॒स्मिन्सु ते॒ सव॑ने अस्त्वो॒क्यं॑ सु॒त इ॒ष्टौ म॑घवन्बो॒ध्याभ॑गः ॥ (९)
हे धनस्वामी इंद्र! मैं तुम्हारे लिए स्तुतिरूपी शोभन अंकुश धारण करता हूं. इससे प्रेरित होकर तुम शत्रुसेना को नष्ट करने वाले अपने हाथियों को कोंचते हो. इस सोमयाग में तुम्हारा निवास हो. तुम सेवनीय बनकर यज्ञ में हमारी स्तुतियां सुनो. (९)
O Dhanaswami Indra! I hold on to the adornment curb of praise for you. Inspired by this, you crush your elephants who destroy the enemy army. This is your residence in Somyag. You become seventeen and listen to our praises in the yajna. (9)