हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.64.2

मंडल 10 → सूक्त 64 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 64
क्र॒तू॒यन्ति॒ क्रत॑वो हृ॒त्सु धी॒तयो॒ वेन॑न्ति वे॒नाः प॒तय॒न्त्या दिशः॑ । न म॑र्डि॒ता वि॑द्यते अ॒न्य ए॑भ्यो दे॒वेषु॑ मे॒ अधि॒ कामा॑ अयंसत ॥ (२)
हमारे हृदयों में निहित बुद्धियां यज्ञ करने की इच्छा करती हैं. हमारी बुद्धियां देवों की कामना करती हैं. हमारी कामनाएं फलप्राप्ति के लिए देवों के पास जाती हैं. इन देवों के अतिरिक्त कोई भी हमारा सुखदाता नहीं है. हमारी अभिलाषाएं इंद्रादि देवों तक सीमित हैं. (२)
The intellects contained in our hearts desire to perform yajna. Our intellects desire gods. Our wishes go to the gods for fruition. Apart from these gods, no one is our giver of happiness. Our desires are limited to the Indradi Devas. (2)