ऋग्वेद (मंडल 10)
प्र ते॑ऽरद॒द्वरु॑णो॒ यात॑वे प॒थः सिन्धो॒ यद्वाजा॑ँ अ॒भ्यद्र॑व॒स्त्वम् । भूम्या॒ अधि॑ प्र॒वता॑ यासि॒ सानु॑ना॒ यदे॑षा॒मग्रं॒ जग॑तामिर॒ज्यसि॑ ॥ (२)
हे सिंधु! तुम जिस समय उपजाऊ स्थानों की ओर बही, उस समय वरुण ने तुम्हारे गमन के लिए विस्तृत मार्ग बनाया. तुम धरती के ऊपर उच्चमार्ग से जाती हो. तुम सभी नदियों के अग्र भाग में विराजमान हो. (२)
O Sindhu! At the time when you led the book to fertile places, Varuna made a detailed path for your movement. You go up the high path above the earth. You are sitting in the front of all the rivers. (2)