हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.79.3

मंडल 10 → सूक्त 79 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 79
प्र मा॒तुः प्र॑त॒रं गुह्य॑मि॒च्छन्कु॑मा॒रो न वी॒रुधः॑ सर्पदु॒र्वीः । स॒सं न प॒क्वम॑विदच्छु॒चन्तं॑ रिरि॒ह्वांसं॑ रि॒प उ॒पस्थे॑ अ॒न्तः ॥ (३)
बालक के समान यह अग्नि धरतीरूपी माता के ऊपर बड़ी-बड़ी लताओं एवं उनकी जड़ों की कामना करते हुए आगे बढ़ते हैं. यह धरती की गोदी में सूखे वृक्षों को पके अन्न के समान प्राप्त करते हैं तथा अपनी ज्वाला से वृक्षों को जलाते हैं. (३)
Like a child, this agni moves forward on the mother of the earth, wishing for great vines and their roots. They get the dried trees in the earth's dock like ripe food and burn the trees with their own flames. (3)