ऋग्वेद (मंडल 10)
र॒क्षो॒हणं॑ वा॒जिन॒मा जि॑घर्मि मि॒त्रं प्रथि॑ष्ठ॒मुप॑ यामि॒ शर्म॑ । शिशा॑नो अ॒ग्निः क्रतु॑भिः॒ समि॑द्धः॒ स नो॒ दिवा॒ स रि॒षः पा॑तु॒ नक्त॑म् ॥ (१)
मैं राक्षसों के हंता शक्तिशाली यजमानों के मित्र और अधिक स्थूल अग्नि का घृत से हवन करता हूं एवं अग्नि के घर के पास जाता हूं. ज्वालाओं को तेज करने वाले अग्नि यजमानों द्वारा प्रज्वलित होते हैं. वे हमें हिंसक राक्षसों से रात-दिन बचावें. (१)
I pray to the house of agni and the more gross agni, the friend of the mighty hosts of the demons and go to the house of agni. Flames that intensify are ignited by hosts. They protect us day and night from violent monsters. (1)