हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.87.11

मंडल 10 → सूक्त 87 → श्लोक 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 87
त्रिर्या॑तु॒धानः॒ प्रसि॑तिं त एत्वृ॒तं यो अ॑ग्ने॒ अनृ॑तेन॒ हन्ति॑ । तम॒र्चिषा॑ स्फू॒र्जय॑ञ्जातवेदः सम॒क्षमे॑नं गृण॒ते नि वृ॑ङ्धि ॥ (११)
हे अग्नि! राक्षस तीन बार तुम्हारी लपटों में जावे. जो राक्षस असत्य से सत्य को मारता है, उसे तुम अपने तेज से भस्म कर दो. हे जातवेद अग्नि! इस राक्षस को मेरे सामने ही टुकड़े-टुकड़े कर दो. (११)
O agni! Let the monster go into your flames three times. The monster who kills the truth with untruth, consume him with your own glory. O Jativeda Agni! Cut this monster to pieces in front of me. (11)