हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.88.2

मंडल 10 → सूक्त 88 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 88
गी॒र्णं भुव॑नं॒ तम॒साप॑गूळ्हमा॒विः स्व॑रभवज्जा॒ते अ॒ग्नौ । तस्य॑ दे॒वाः पृ॑थि॒वी द्यौरु॒तापोऽर॑णय॒न्नोष॑धीः स॒ख्ये अ॑स्य ॥ (२)
अंधकार द्वारा निगला हुआ एवं अंधकार में छिपा हुआ संसार अग्नि के उत्पन्न होने पर प्रकट होता है. उस अनने के मैत्रीपूर्ण कार्य से देवगण पृथ्वी स्वर्ग, जल एवं ओषधियां-सब प्रस्न होते हैं. (२)
The world, swallowed by darkness and hidden in darkness, appears when agni is created. By the friendly work of that ane, the gods are presented to the earth, heaven, water and herbs. (2)