ऋग्वेद (मंडल 10)
सू॒क्त॒वा॒कं प्र॑थ॒ममादिद॒ग्निमादिद्ध॒विर॑जनयन्त दे॒वाः । स ए॑षां य॒ज्ञो अ॑भवत्तनू॒पास्तं द्यौर्वे॑द॒ तं पृ॑थि॒वी तमापः॑ ॥ (८)
देवों ने सबसे पहले मन से सूक्त वचन का चिंतन किया. इसके पश्चात् हव्य को उत्पन्न किया. वे अग्नि देवों के यज्ञपात्र एवं शरीररक्षक बने. उन अग्नि को झुलोक, पृथ्वी और अंतरिक्ष जानते हैं. (८)
The gods first thought of the sukta word from the mind. After this, the havya was produced. He became the sacrificial and body protector of the agni gods. Those agnis know the jhullok, earth and space. (8)