हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.95.16

मंडल 10 → सूक्त 95 → श्लोक 16 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 95
यद्विरू॒पाच॑रं॒ मर्त्ये॒ष्वव॑सं॒ रात्रीः॑ श॒रद॒श्चत॑स्रः । घृ॒तस्य॑ स्तो॒कं स॒कृदह्न॑ आश्नां॒ तादे॒वेदं ता॑तृपा॒णा च॑रामि ॥ (१६)
मैंने अनेक रूप धारण करके मानवों में भ्रमण किया है. मैं चार वर्ष तक रात के समय मानवों के बीच रही हूं. मैं दिन में एक बार घी पीकर तृप्त हो गई हूं और विचरण करती रही हुं.” (१६)
I have taken many forms and traveled among human beings. I've been among people at night for four years. I have been satiated once a day after drinking ghee and have been walking around." (16)