ऋग्वेद (मंडल 2)
त्रिक॑द्रुकेषु महि॒षो यवा॑शिरं तुवि॒शुष्म॑स्तृ॒पत्सोम॑मपिब॒द्विष्णु॑ना सु॒तं यथाव॑शत् । स ईं॑ ममाद॒ महि॒ कर्म॒ कर्त॑वे म॒हामु॒रुं सैनं॑ सश्चद्दे॒वो दे॒वं स॒त्यमिन्द्रं॑ स॒त्य इन्दुः॑ ॥ (१)
पूज्य, परम शक्तिशाली एवं सबको तृप्त करने वाले इंद्र ने पूर्वकाल में की हुई कामना के अनुसार जौ के सत्तुओं से मिला हुआ सोमरस विष्णु के साथ पिया. महान् सोमरस ने इंद्र को महान् कर्म करने की प्रेरणा दी. सत्य एवं दीप्त सोमरस सच्चे एवं दीप्त इंद्र को व्याप्त करे. (१)
The revered, the most powerful and the satiating of all, Indra, drank the somras mixed with barley sattus with Vishnu as per the earlier wish. The great Somras inspired Indra to do great deeds. May the truth and the bright somers permeate the true and the bright Indra. (1)