ऋग्वेद (मंडल 2)
तेजि॑ष्ठया तप॒नी र॒क्षस॑स्तप॒ ये त्वा॑ नि॒दे द॑धि॒रे दृ॒ष्टवी॑र्यम् । आ॒विस्तत्कृ॑ष्व॒ यदस॑त्त उ॒क्थ्यं१॒॑ बृह॑स्पते॒ वि प॑रि॒रापो॑ अर्दय ॥ (१४)
हे बृहस्पति! जिन राक्षसों ने युद्धों में तुम्हारा पराक्रम देखकर भी तुम्हारी निंदा की है, अत्यंत तीव्र एवं संतापकारिणी तलवार द्वारा उन राक्षसों को संतप्त करो, अपने प्राचीन प्रशंसा योग्य बल को प्रकट करो तथा निंदकों का नाश करो. (१४)
O Jupiter! The demons who have condemned you even after seeing your might in wars, provoke those demons with a very strong and angry sword, reveal your ancient praiseworthy strength and destroy the blasphemers. (14)