ऋग्वेद (मंडल 2)
बृह॑स्पते॒ अति॒ यद॒र्यो अर्हा॑द्द्यु॒मद्वि॒भाति॒ क्रतु॑म॒ज्जने॑षु । यद्दी॒दय॒च्छव॑स ऋतप्रजात॒ तद॒स्मासु॒ द्रवि॑णं धेहि चि॒त्रम् ॥ (१५)
हे यज्ञ से उत्पन्न बृहस्पति! हमें श्रेष्ठ लोगों द्वारा पूज्य, दीप्त एवं ज्ञान से युक्त, यज्ञकर्तताओं में सुशोभित तेज तथा दीप्तियुक्त विचित्र धन प्रदान करो. (१५)
O Jupiter born of the yajna! Give us the strange riches of bright and radiant adorned in the sacrificial acts, revered, illuminated and enlightened by the best of people. (15)