ऋग्वेद (मंडल 2)
इ॒दं क॒वेरा॑दि॒त्यस्य॑ स्व॒राजो॒ विश्वा॑नि॒ सान्त्य॒भ्य॑स्तु म॒ह्ना । अति॒ यो म॒न्द्रो य॒जथा॑य दे॒वः सु॑की॒र्तिं भि॑क्षे॒ वरु॑णस्य॒ भूरेः॑ ॥ (१)
यह हव्य क्रांतदर्शी एवं स्वयं शोभित आदित्य के लिए है. वे अपने महत्त्व से सभी प्राणियों को पराजित करते हैं. तेजस्वी वरुण यजमान को प्रसन्न करते हैं. मैं वरुण से अधिक कीर्ति की याचना करता हूं. (१)
This is for the havya krantidarshi and the self-absorbed Aditya. They defeat all beings by their importance. The stunning Varuna pleases the host. I beg for more kirti than Varun. (1)
ऋग्वेद (मंडल 2)
तव॑ व्र॒ते सु॒भगा॑सः स्याम स्वा॒ध्यो॑ वरुण तुष्टु॒वांसः॑ । उ॒पाय॑न उ॒षसां॒ गोम॑तीनाम॒ग्नयो॒ न जर॑माणा॒ अनु॒ द्यून् ॥ (२)
हे वरुण! हम भली प्रकार ध्यान, तुम्हारी स्तुति एवं सेवा करते हुए सौभाग्य प्राप्त करें. जिस प्रकार किरणों वाली उषाओं के आने पर अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार हम प्रतिदिन तुम्हारी स्तुति करते हुए दीप्तिसंपन्न हों. (२)
Hey Varun! May we be fortunate to be well-meditated, praised and served by you. Just as the agni ignites when the rays of the ushas come, so may we be illuminated, praising you every day. (2)
ऋग्वेद (मंडल 2)
तव॑ स्याम पुरु॒वीर॑स्य॒ शर्म॑न्नुरु॒शंस॑स्य वरुण प्रणेतः । यू॒यं नः॑ पुत्रा अदितेरदब्धा अ॒भि क्ष॑मध्वं॒ युज्या॑य देवाः ॥ (३)
हे विश्वनायक, अनेक वीरों से युक्त एवं बहुत से लोगों द्वारा स्तुत्य वरुण! हम तुम्हारे गृह में निवास करें. हे शत्रुओं द्वारा अहिंसित अदितिपुत्रो! अपना मित्र बनाते समय हमारे सभी अपराधों को क्षमा कर देना. (३)
O Vishwanayak, Varuna with many heroes and praised by many people! We stay in your home. O Aditiputras, who are non-violent by enemies! Forgive all our sins when making your friend. (3)
ऋग्वेद (मंडल 2)
प्र सी॑मादि॒त्यो अ॑सृजद्विध॒र्ताँ ऋ॒तं सिन्ध॑वो॒ वरु॑णस्य यन्ति । न श्रा॑म्यन्ति॒ न वि मु॑चन्त्ये॒ते वयो॒ न प॑प्तू रघु॒या परि॑ज्मन् ॥ (४)
विश्वधारक एवं अदितिपुत्र वरुण ने जल बनाया है. उन्हीं के महत्त्व से नदियां बहती हैं. नदियां न कभी विश्राम करती हैं और न पीछे लोटती हैं. ये शीघ्रगामिनी नदियां पक्षियों के समान वेग से धरती पर बहती हैं. (४)
Varuna, the world-holder and the son of Aditi, has made water. The rivers flow from their importance. Rivers never rest or retreat. These early-lived rivers flow on the earth at the same speed as birds. (4)
ऋग्वेद (मंडल 2)
वि मच्छ्र॑थाय रश॒नामि॒वाग॑ ऋ॒ध्याम॑ ते वरुण॒ खामृ॒तस्य॑ । मा तन्तु॑श्छेदि॒ वय॑तो॒ धियं॑ मे॒ मा मात्रा॑ शार्य॒पसः॑ पु॒र ऋ॒तोः ॥ (५)
हे वरुण! पाप ने मुझे रस्सी के समान बांध लिया है. मुझे इससे छुड़ाओ. हम तुम्हारी जलपूर्ण नदी को प्राप्त करें. यज्ञकर्म करते समय मेरा कार्य रुके नहीं. यज्ञ समाप्ति से पहले मेरा शरीर कभी शिथिल न हो. (५)
Hey Varun! Sin has tied me up like a rope. Get me out of it. Let's get to your watery river. My work did not stop while doing yajnakarma. Never let my body relax before the end of the yajna. (5)
ऋग्वेद (मंडल 2)
अपो॒ सु म्य॑क्ष वरुण भि॒यसं॒ मत्सम्रा॒ळृता॒वोऽनु॑ मा गृभाय । दामे॑व व॒त्साद्वि मु॑मु॒ग्ध्यंहो॑ न॒हि त्वदा॒रे नि॒मिष॑श्च॒नेशे॑ ॥ (६)
हे वरुण! भय को मेरे पास से हटाओ. हे शोभासंपन्न एवं सत्ययुक्त! मुझ पर अनुग्रह करो. जिस प्रकार बंधे हुए बछड़े को रस्सी से छुड़ाते हैं, उसी प्रकार मुझे पाप से छुड़ाओ. तुमसे दूर रहकर कोई एक पल के लिए भी अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता. (६)
Hey Varun! Remove the fear from me. O glorious and truthful! Have mercy on me. Just as you deliver the tied calf from the rope, so deliver me from sin. By staying away from you, no one can gain authority even for a moment. (6)
ऋग्वेद (मंडल 2)
मा नो॑ व॒धैर्व॑रुण॒ ये त॑ इ॒ष्टावेनः॑ कृ॒ण्वन्त॑मसुर भ्री॒णन्ति॑ । मा ज्योति॑षः प्रवस॒थानि॑ गन्म॒ वि षू मृधः॑ शिश्रथो जी॒वसे॑ नः ॥ (७)
हे प्राणरक्षक वरुण! तुम्हारे जो आयुध यज्ञविरोधियों का विनाश करते हैं, वे हमें न मारें. हम सूर्य के प्रकाश से दूर न रहें. हमारे जीवन के हिंसकों को हमसे दूर हटाओ. (७)
O lifeguard Varun! Let not your weapons that destroy the anti-sacrificors kill us. Let's not stay away from sunlight. Remove the violents of our lives from us. (7)
ऋग्वेद (मंडल 2)
नमः॑ पु॒रा ते॑ वरुणो॒त नू॒नमु॒ताप॒रं तु॑विजात ब्रवाम । त्वे हि कं॒ पर्व॑ते॒ न श्रि॒तान्यप्र॑च्युतानि दूळभ व्र॒तानि॑ ॥ (८)
हे अनेक प्रदेशों में प्रकट होने वाले वरुण! हमने भूतकाल में तुम्हें नमस्कार किया है, वर्तमान काल में करते हैं और भविष्यत् काल में करेंगे. हे हिंसा के अयोग्य वरुण! तुम में पर्वत के समान अच्युत शक्तियां व्याप्त हैं. (८)
O Varuna who appears in many regions! We have greeted you in the past, do it in the present tense and will do so in the future. O Varuna unworthy of violence! You have a power of achyuta like a mountain. (8)