ऋग्वेद (मंडल 2)
इ॒दं क॒वेरा॑दि॒त्यस्य॑ स्व॒राजो॒ विश्वा॑नि॒ सान्त्य॒भ्य॑स्तु म॒ह्ना । अति॒ यो म॒न्द्रो य॒जथा॑य दे॒वः सु॑की॒र्तिं भि॑क्षे॒ वरु॑णस्य॒ भूरेः॑ ॥ (१)
यह हव्य क्रांतदर्शी एवं स्वयं शोभित आदित्य के लिए है. वे अपने महत्त्व से सभी प्राणियों को पराजित करते हैं. तेजस्वी वरुण यजमान को प्रसन्न करते हैं. मैं वरुण से अधिक कीर्ति की याचना करता हूं. (१)
This is for the havya krantidarshi and the self-absorbed Aditya. They defeat all beings by their importance. The stunning Varuna pleases the host. I beg for more kirti than Varun. (1)