हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 2.29.1

मंडल 2 → सूक्त 29 → श्लोक 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 29
धृत॑व्रता॒ आदि॑त्या॒ इषि॑रा आ॒रे मत्क॑र्त रह॒सूरि॒वागः॑ । श‍ृ॒ण्व॒तो वो॒ वरु॑ण॒ मित्र॒ देवा॑ भ॒द्रस्य॑ वि॒द्वाँ अव॑से हुवे वः ॥ (१)
हे व्रतधारी, सबके प्रार्थनीय एवं शीघ्रगामी अदितिपुत्रो! जिस प्रकार व्यभिचारिणी गुप्तरूप से जन्म लेने वाले बालक को दूर फेंक देती है, उसी प्रकार तुम मेरा पाप मुझसे दूर हटा दो. हे मित्र और वरुण! मैं तुम्हारे द्वारा किए हुए मंगल कार्यों को जानता हूं. मैं तुम्हें रक्षा के लिए बुलाता हूं. तुम मेरी पुकार सुनो. (१)
O fasting, all the prayable and soon-to-do Aditiputras! Just as the adulterer throws away the child who is born secretly, so take away my sin from me. Hey friend and Varun! I know the good work you have done. I'll call you to the defense. You listen to my call. (1)