ऋग्वेद (मंडल 2)
क्व१॒॑ स्य ते॑ रुद्र मृळ॒याकु॒र्हस्तो॒ यो अस्ति॑ भेष॒जो जला॑षः । अ॒प॒भ॒र्ता रप॑सो॒ दैव्य॑स्या॒भी नु मा॑ वृषभ चक्षमीथाः ॥ (७)
हे रुद्र! तुम्हारा वह सुखदाता हाथ कहां है, जो सबको सुख पहुंचाने वाली दवाएं बनाता है? हे कामवर्षक रुद्र! तुम देवकृत पाप का विनाश करते हुए मुझे जल्दी क्षमा करो. (७)
Hey Rudra! Where is your hand of happiness that makes the medicines that bring happiness to all? O workman Rudra! Forgive me quickly, destroying godly sin. (7)