हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 2.41.12

मंडल 2 → सूक्त 41 → श्लोक 12 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
इन्द्र॒ आशा॑भ्य॒स्परि॒ सर्वा॑भ्यो॒ अभ॑यं करत् । जेता॒ शत्रू॒न्विच॑र्षणिः ॥ (१२)
शत्रुओं को जीतने वाले एवं मेधावी इंद्र हमें चारों दिशाओं से भयरहित करें. (१२)
May indra, who conquers the enemies and the brilliant, make us fearless from all four directions. (12)