हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
वायो॒ ये ते॑ सह॒स्रिणो॒ रथा॑स॒स्तेभि॒रा ग॑हि । नि॒युत्वा॒न्सोम॑पीतये ॥ (१)
हे वायु! तुम्हारे पास जो हजारों रथ हैं, उनके द्वारा नियुतगणों के साथ सोमरस पीने के लिए आओ. (१)
O air! Come to drink somras with the appointees of the thousands of chariots that you have. (1)

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
नि॒युत्वा॑न्वाय॒वा ग॑ह्य॒यं शु॒क्रो अ॑यामि ते । गन्ता॑सि सुन्व॒तो गृ॒हम् ॥ (२)
हे वायु! नियुतों सहित आओ. यह दीप्तिमान्‌ सोम तुम्हारे लिए है. तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान के घर जाते हो. (२)
O air! Come with the employables. This Deeptiman som is for you. You go to the house of the host who squeezes the Somras. (2)

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
शु॒क्रस्या॒द्य गवा॑शिर॒ इन्द्र॑वायू नि॒युत्व॑तः । आ या॑तं॒ पिब॑तं नरा ॥ (३)
हे नेता इंद्र और वायु! तुम आज नियुतों के साथ गव्य मिले सोम पीने के लिए आओ. (३)
O leader Indra and Air! You come to drink the som you met gavya with the appointed ones today. (3)

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
अ॒यं वां॑ मित्रावरुणा सु॒तः सोम॑ ऋतावृधा । ममेदि॒ह श्रु॑तं॒ हव॑म् ॥ (४)
हे यज्ञवर्द्धक मित्र एवं वरुण! तुम्हारे लिए यह सोम निचोड़ा गया है. तुम हमारी पुकार सुनो. (४)
O sacrificial friend and Varuna! For you it has been som squeezed. You hear our call. (4)

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
राजा॑ना॒वन॑भिद्रुहा ध्रु॒वे सद॑स्युत्त॒मे । स॒हस्र॑स्थूण आसाते ॥ (५)
शत्रुरहित एवं दीप्तिमान्‌ मित्र व वरुण! ध्रुव, ऊंचे और हजार खंभों वाले इस स्थान में बैठो. (५)
Without enemies and bright friends and Varuna! Sit in this place with poles, high and thousand pillars. (5)

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
ता स॒म्राजा॑ घृ॒तासु॑ती आदि॒त्या दानु॑न॒स्पती॑ । सचे॑ते॒ अन॑वह्वरम् ॥ (६)
सबके शासक, घृत रूपी अन्न का भोजन करने वाले, अदितिपुत्र व दानशील मित्र तथा वरुण यजमान की सेवा करते हैं. (६)
The rulers of all, the eaters of the food in the form of disgust, the sons of Aditi and the danshil friends and Varuna serve the host. (6)

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
गोम॑दू॒ षु ना॑स॒त्याश्वा॑वद्यातमश्विना । व॒र्ती रु॑द्रा नृ॒पाय्य॑म् ॥ (७)
हे सत्यवादी अश्विनीकुमारो एवं रुद्रो! यज्ञ के नेता देवों के पीने योग्य सोम को गायों तथा अश्वों से युक्त करके अपने मार्ग से लाओ. (७)
O truthful Ashwinikumaro and Rudra! The leader of the yajna, bring the drinkable mon of the devas from your way by containing cows and horses. (7)

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
न यत्परो॒ नान्त॑र आद॒धर्ष॑द्वृषण्वसू । दुः॒शंसो॒ मर्त्यो॑ रि॒पुः ॥ (८)
हे धनवर्षक अश्चिनीकुमारो! हमें ऐसा धन दो, जिसे न दूरवर्ती और न समीपवर्ती शन्रु मनुष्य चुरा सके. (८)
O rich year ashchinikumaro! Give us money that neither remote nor near-term humans can steal. (8)
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