ऋग्वेद (मंडल 2)
अ॒यं वां॑ मित्रावरुणा सु॒तः सोम॑ ऋतावृधा । ममेदि॒ह श्रु॑तं॒ हव॑म् ॥ (४)
हे यज्ञवर्द्धक मित्र एवं वरुण! तुम्हारे लिए यह सोम निचोड़ा गया है. तुम हमारी पुकार सुनो. (४)
O sacrificial friend and Varuna! For you it has been som squeezed. You hear our call. (4)