ऋग्वेद (मंडल 3)
इ॒मं य॒ज्ञं स॑हसाव॒न्त्वं नो॑ देव॒त्रा धे॑हि सुक्रतो॒ ररा॑णः । प्र यं॑सि होतर्बृह॒तीरिषो॒ नोऽग्ने॒ महि॒ द्रवि॑ण॒मा य॑जस्व ॥ (२२)
हे शक्तिशाली एवं उत्तम कर्म वाले अग्नि! तुम सदैव रमण करते हुए हमारे यज्ञ को देवों के समीप पहुंचाओ. हे देवों के होता अग्नि! हमें अन्न एवं अधिक धन दो. (२२)
O mighty and good-working agni! You always bring our yajna closer to the gods. O agni of the gods! Give us food and more money. (22)