ऋग्वेद (मंडल 3)
अग्न॒ इन्द्र॑श्च दा॒शुषो॑ दुरो॒णे सु॒ताव॑तो य॒ज्ञमि॒होप॑ यातम् । अम॑र्धन्ता सोम॒पेया॑य देवा ॥ (४)
हे अग्नि! इंद्र के साथ यहां आकर यज्ञ की हिंसा न करते हुए सोम निचोड़ने वाले यजमान के घर में सोम पीने के लिए आओ. (४)
O agni! Come here with Indra and drink som in the house of the host who squeezes the som without doing the violence of yajna. (4)