हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 3.25.5

मंडल 3 → सूक्त 25 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 25
अग्ने॑ अ॒पां समि॑ध्यसे दुरो॒णे नित्यः॑ सूनो सहसो जातवेदः । स॒धस्था॑नि म॒हय॑मान ऊ॒ती ॥ (५)
हे बल के पुत्र, अविनाशी एवं जातवेद अग्नि! रक्षा के द्वारा लोकों को महान्‌ बनाते हुए तुम जल के स्थान आकाश में भली प्रकार प्रकाशित होते हो. (५)
O son of the force, the indestructible and the Jatveda Agni! By making the people great by defense, you are well illuminated in the sky instead of water. (5)