ऋग्वेद (मंडल 3)
अ॒ग्निर॑स्मि॒ जन्म॑ना जा॒तवे॑दा घृ॒तं मे॒ चक्षु॑र॒मृतं॑ म आ॒सन् । अ॒र्कस्त्रि॒धातू॒ रज॑सो वि॒मानोऽज॑स्रो घ॒र्मो ह॒विर॑स्मि॒ नाम॑ ॥ (७)
हे कुशिकगोत्रीय ब्राह्मणो! मैं जन्म से ही सर्वज्ञ अग्नि हूं. घृत मेरा नेत्र है तथा अमृत मेरे मुख में रहता है. मेरे प्राण तीन प्रकार के हैं. मैं आकाश को नापने वाला, नित्यप्रकाशयुक्त एवं हव्यरूप हूं. (७)
O Kushikgotriya Brahmins! I have been an omniscient agni since birth. Disgust is my eye and nectar lives in my mouth. There are three types of my soul. I am a ruler of the sky, constantly illuminated and in a state of flux. (7)