ऋग्वेद (मंडल 3)
यदी॒ मन्थ॑न्ति बा॒हुभि॒र्वि रो॑च॒तेऽश्वो॒ न वा॒ज्य॑रु॒षो वने॒ष्वा । चि॒त्रो न याम॑न्न॒श्विनो॒रनि॑वृतः॒ परि॑ वृण॒क्त्यश्म॑न॒स्तृणा॒ दह॑न् ॥ (६)
जब हाथों से अरणि का मंथन किया जाता है, तब लकड़ियों में अग्नि इस प्रकार तीव्र गति से सुशोभित होते हैं, जिस प्रकार शीघ्रगामी अश्व अथवा अश्चिनीकुमारों का अनेक रंग का रथ शोभा पाता है. अवरोधरहित अग्नि पत्थरों और तिनकों को जलाते हुए आगे बढ़ते हैं. (६)
When the arny is churned with the hands, the agni in the woods is adorned at such a rapid pace, just as the fast-moving horse or the multi-colored chariot of the Ashchinikumars adorns. The unhindered agni proceeds by burning stones and straws. (6)