हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 3.31.1

मंडल 3 → सूक्त 31 → श्लोक 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
शास॒द्वह्नि॑र्दुहि॒तुर्न॒प्त्यं॑ गाद्वि॒द्वाँ ऋ॒तस्य॒ दीधि॑तिं सप॒र्यन् । पि॒ता यत्र॑ दुहि॒तुः सेक॑मृ॒ञ्जन्सं श॒ग्म्ये॑न॒ मन॑सा दध॒न्वे ॥ (१)
बिना पुत्र वाला पिता यह जानता हुआ कि इस कन्या का पुत्र मेरा पुत्र होगा, पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ दामाद की सेवा करता हुआ शास्त्र के अनुसार उसके पास गया. ऐसी कन्या का पति उस में सुख का ध्यान करता हुआ वीर्याधान करता है, पुत्र उत्पन्न करने के लिए नहीं. (१)
The father without a son knew that the son of this girl would be my son, went to him according to the scriptures, serving the son-in-law who was able to produce a son. The husband of such a girl takes care of happiness in her and gives her semen, not to produce a son. (1)